उत्तराखंड में 80 हजार से अधिक बंदरों की नसबंदी

उत्तराखंड सरकार ने राज्य के कई जिलों में जीवन और संपत्ति को खतरा पहुंचा रहे बंदरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए हरिद्वार के रसियाबाद क्षेत्र में स्थित अत्याधुनिक नसबंदी केंद्र में अब तक 80,000 से अधिक बंदरों की नसबंदी कराई है।

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साल 2015 में हरिद्वार-नजीबाबाद मार्ग पर स्थापित इस केंद्र में एक विशेष ऑपरेशन थिएटर बनाया गया है जहां मुख्य रूप से गढ़वाल के जिलों से पकड़े गए बंदरों की नसबंदी की जाती है। वन विभाग की एसडीओ पूनम के अनुसार, अब तक केंद्र में 98,000 बंदरों को लाया गया है, जिनमें से लगभग 80,000 बंदरों की नसबंदी करके उन्हें वापस जंगल में छोड़ दिया गया है।

14000 की हो चुकी नसबंदी

चालू वित्तीय वर्ष 2024-2025 में ही अब तक लगभग 14,000 बंदरों की नसबंदी की जा चुकी है। केंद्र में 12 लोगों की एक टीम कार्यरत है, जिसमें दो वरिष्ठ डॉक्टर और 10 कर्मचारी शामिल हैं जो बंदरों को पकड़ते हैं, उनकी नसबंदी करते हैं और फिर उन्हें जंगल में छोड़ देते हैं। केंद्र में एक साथ 300 बंदरों को रखने की क्षमता है।

हर पहलू को रखा जाता ध्यान

केंद्र में तैनात पशु चिकित्सक डॉ. प्रेमा ने बताया कि उत्तराखंड में बंदरों की नसबंदी के दौरान हर पहलू का ध्यान रखा जाता है। प्रक्रिया के तहत, सबसे पहले बंदरों की जांच की जाती है और देखा जाता है कि क्या बंदर को कोई बीमारी है या नहीं। यदि मादा बंदर गर्भवती है, तो पूरी सावधानी के साथ उसे वहीं छोड़ दिया जाता है जहां से उसे पकड़ा गया था, और यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि वह अपने झुंड से अलग न हो।

वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. अमित ध्यानी ने बताया कि केंद्र में एक अत्याधुनिक अल्ट्रासाउंड मशीन है जिसमें बंदरों की बारीकी से जांच की जाती है और यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी मादा बंदर गर्भवती न हो। यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इस समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।

उत्तराखंड में बंदरों की नसबंदी के लिए कुछ जरुरी कदम

  • अधिक केंद्रों की स्थापना: राज्य के विभिन्न हिस्सों में इस तरह के अधिक केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि नसबंदी अभियान को तेज़ी से आगे बढ़ाया जा सके।
  • मानव-बंदर संघर्ष को कम करने के अन्य उपाय: नसबंदी के साथ-साथ फसल सुरक्षा के लिए नवीन तकनीकों और पद्धतियों का विकास करना चाहिए।
  • जन जागरूकता अभियान: स्थानीय लोगों को बंदरों से सुरक्षित रहने और उनके साथ सह-अस्तित्व के लिए जागरूक किया जाना चाहिए।
  • वैज्ञानिक अध्ययन: बंदरों के व्यवहार और पर्यावास पर नसबंदी के प्रभाव का अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि भविष्य की रणनीतियों को बेहतर बनाया जा सके।
  • समुदाय आधारित निगरानी: स्थानीय समुदायों को बंदरों की गतिविधियों की निगरानी और रिपोर्टिंग में शामिल किया जाना चाहिए।
  • इस दिशा में समग्र और निरंतर प्रयासों से ही उत्तराखंड राज्य इस गंभीर मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपट सकेगा और मानव और वन्यजीव दोनों के लिए एक सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित कर सकेगा।
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