बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुना दी है। यह फैसला 2024 में छात्र प्रदर्शनों के दौरान घातक बल के इस्तेमाल से जुड़े मामले में आया है, जहां सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी। हसीना, जो फिलहाल भारत में निर्वासन में हैं, को अनुपस्थिति में दोषी ठहराया गया है।
ट्रिब्यूनल ने 17 नवंबर को यह फैसला सुनाया, जिसमें हसीना और उनके बेटे सज्जीब वाजेद को भी मौत की सजा दी गई है। मामले की सुनवाई ढाका में हुई, जहां अदालत ने कहा कि पूर्व सरकार के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई अपराधपूर्ण थी। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस फैसले को पीड़ितों के लिए महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन ट्रायल की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मौत की सजा की आलोचना की है, कहते हुए कि इससे पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता।
शेख हसीना ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे “एकतरफा और राजनीति से प्रेरित” करार दिया। एक बयान में हसीना ने कहा, “यह फैसला मेरा पक्ष सुने बिना दिया गया। यह फैसला ऐसे ट्रिब्यूनल ने दिया है जिसे एक गैर-निर्वाचित सरकार चला रही है। उनके पास जनता का कोई जनादेश नहीं है। ये पूरी तरह से गलत है।” हसीना का कहना है कि वर्तमान अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं, राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही है।
यह मामला 2024 के जुलाई में हुए छात्र आंदोलन से जुड़ा है, जब सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों में पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम 300 लोग मारे गए थे। आंदोलन के बढ़ने पर हसीना की सरकार गिर गई और वे देश छोड़कर भाग गईं। अब ट्रिब्यूनल ने उन्हें “जनसंहार” के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
हसीना के वकीलों ने कहा है कि वे इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगे, लेकिन चूंकि वे देश से बाहर हैं, प्रक्रिया जटिल हो सकती है। बांग्लादेश सरकार ने भारत से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है, लेकिन अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है। यह घटनाक्रम बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता को और गहरा सकता है।
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